सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

अहम् अौर ईश्वर

मानव तन असंख्य कोशिकाओं से बना है। हर कोशिका अपने आप में एक जीवित इकाई है। यह शरीर  अनगिणत सूक्ष्म शरीर (कोशिकाओं) का मानो एक सुव्यवस्थित समाज है। हर कोशिका अपना काम निरंतर करती रहती है, बगैर इस शरीर के बोध के।

यह शरीर चेतन है, यह चेतना हमें "अहं" का बोध देती है। मगर इस "अहं" का बोध इस शरीर को बनाने वाली किसी भी कोशिका को तो नहीं होता। कोशिकाएँ निजी स्तर पर चेतन नहीं होती हैं। कोशिकाएँ, जिनका अस्तित्व भौतिक स्तर पर एक निश्चित सत्य है इस "अहं" से अनभिज्ञ होती हैं। तो जिसे मैं "मैं" जानता हूँ, क्या वह सत्य नहीं है। नहीं,  मुझे मलूम है कि "मैं" हूँ।

इसी तरह यह जगत  अनेक चेतन एवं अवचेतन इकाईयाँ का एक सुव्यवस्थित समाज है। मनुष्य उनमें से एक है। और ईश्वर इस जगत का अतिचेतन स्वरूप है। और हम उसके अस्तित्व से वैसे ही अनभिज्ञ जैसे कोशिका हमारे अस्तित्व से।

शनिवार, 5 नवंबर 2016

एक साझा स्वप्न : नयागाँव में नया घर का ख्याल

हमारे परिवार की छोटी सी लंबी कहानी है।
हमारी सबसे पुरानी स्मृति वेद की ऋचाएँ हैं, फिर रामायण- महाभारत के मिथकों की गलियों से गुजरते हम एक लंबी नींद में सो जाते हैं। अब जो याद है वह ४-५ पीढी़ से ज्यादा पुरानी नहीं है। भारत के पूर्वी प्रदेश बिहार में गंगा नदी के उत्तरी तट पर एक पुराना सा गाँव है- नयागाँव। नाम इस बात का पता देता है कि पुरातन सा दीखने वाला यह गाँव कभी नया था।

हमारे पिता जी बिहार प्रदेश में जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के सर्वोच्च अभियंता पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उनकी मधुरतम स्मृति इसी नयागाँव से जुड़ी है जहाँ उनका बचपन गुजरा। माताजी का परिवार गंगा के दक्षिणी तट पर स्थित एक गाँव से है जिसका नाम- "मराँची" - मेरे मन में सदैव एक कुतूहल बन कर रहा है कि क्या यहीं के लोग कभी पश्चिमी प्रदेश में सागर तट पर जा कर बसे और बस्ती को नाम दिया "कराँची"!! इस तरह माँ और पिता दोनों ही तरफ से हमारा गंगा तट के गाँव के प्रति एक अनुवांशिक आकर्षण रहा है।

 "इंगलिश समर"- आँग्ल देश में ग्रीष्म ऋतु  सच में बेहद सुंदर होती है- और सबसे सुंदर साल २०१४ के अगस्त माह में , जब माँ और पिता जी महीने भर के लिये यहाँ आये थे। एक सुहानी उज्जवल सुबह, सुबह की चाय के बाद तरोताज़ा हो गपशप के सिलसिले में मन में दबी एक पुरानी ख्वाहिश कि "नयागाँव में एक नया घर हो" फिर से उभर आयी। मम्मी जो "भागवत- श्री कृष्ण" पढ़ रही थीं, ने  अपनी सहमति एवं स्वीकृिति दी। इस स्वीकृिति ने जैसे सपनों में रंग भर दिया। पापा तो सहमत होने ही थे। बड़े और मंझले भाई साहेब को फोन लगाया गया। छोटी बहन राखी, जो कि अब प्रबंधन महाविद्यालय में प्राध्यापिका है, और इस परिवार की "conscience keeper", की सलाह माँगी गयी। मँझले भाई राजीव की प्रतिक्रिया कि यह फिर से बस बातों और ख्यालों का सब्ज़बाग भर तो नहीं, में छिपी उनकी भावनाओं की तीव्रता और स्वप्न को मूर्त रूप देने का संकल्प साफ झलक रहा था। बड़े भाई साहेब संजीव, की व्यवहारिक समझ और अनुभव ही प्रथम प्रश्न "घर हाँ पर कहाँ?" का सही उत्तर दे पाने में सक्षम थी।
और इस तरह एक साझे स्वप्न और संक्लप का बीज सही समय की उर्वर जमीन में पड़ चुका था।

एक साझा स्वप्न : नयागाँव में नया घर का ख्याल

हमारे परिवार की छोटी सी लंबी कहानी है।
हमारी सबसे पुरानी स्मृति वेद की ऋचाएँ हैं, फिर रामायण- महाभारत के मिथकों की गलियों से गुजरते हम एक लंबी नींद में सो जाते हैं। अब जो याद है वह ४-५ पीढी़ से ज्यादा पुरानी नहीं है। भारत के पूर्वी प्रदेश बिहार में गंगा नदी के उत्तरी तट पर एक पुराना सा गाँव है- नयागाँव। नाम इस बात का पता देता है कि पुरातन सा दीखने वाला यह गाँव कभी नया था।

हमारे पिता जी बिहार प्रदेश में जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के सर्वोच्च अभियंता पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उनकी मधुरतम स्मृति इसी नयागाँव से जुड़ी है जहाँ उनका बचपन गुजरा। माताजी का परिवार गंगा के दक्षिणी तट पर स्थित एक गाँव से है जिसका नाम- "मराँची" - मेरे मन में सदैव एक कुतूहल बन कर रहा है कि क्या यहीं के लोग कभी पश्चिमी प्रदेश में सागर तट पर जा कर बसे और बस्ती को नाम दिया "कराँची"!! इस तरह माँ और पिता दोनों ही तरफ से हमारा गंगा तट के गाँव के प्रति एक अनुवांशिक आकर्षण रहा है।

 "इंगलिश समर"- आँग्ल देश में ग्रीष्म ऋतु  सच में बेहद सुंदर होती है- और सबसे सुंदर साल २०१४ के अगस्त माह में , जब माँ और पिता जी महीने भर के लिये यहाँ आये थे। एक सुहानी उज्जवल सुबह, सुबह की चाय के बाद तरोताज़ा हो गपशप के सिलसिले में मन में दबी एक पुरानी ख्वाहिश कि "नयागाँव में एक नया घर हो" फिर से उभर आयी। मम्मी जो "भागवत- श्री कृष्ण" पढ़ रही थीं, ने  अपनी सहमति एवं स्वीकृिति दी। इस स्वीकृिति ने जैसे सपनों में रंग भर दिया। पापा तो सहमत होने ही थे। बड़े और मंझले भाई साहेब को फोन लगाया गया। छोटी बहन राखी, जो कि अब प्रबंधन महाविद्यालय में प्राध्यापिका है, और इस परिवार की "conscience keeper", की सलाह माँगी गयी। मँझले भाई राजीव की प्रतिक्रिया कि यह फिर से बस बातों और ख्यालों का सब्ज़बाग भर तो नहीं, में छिपी उनकी भावनाओं की तीव्रता और स्वप्न को मूर्त रूप देने का संकल्प साफ झलक रहा था। बड़े भाई साहेब संजीव, की व्यवहारिक समझ और अनुभव ही प्रथम प्रश्न "घर हाँ पर कहाँ?" का सही उत्तर दे पाने में सक्षम थी।
और इस तरह एक साझे स्वप्न और संक्लप का बीज सही समय की उर्वर जमीन में पड़ चुका था।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

भारत: कौन अौर किसका?

भारत के इतिहास का अध्यन मेरे मन को दुखी कर देता है. इसमें, कदम कदम  पर पराजय और मौकों को गवाने की कहानी है. बार .बार वे लोग हार जाते हैं जो इस जमीन और यहाँ की संस्कृति का प्रतिनिधित्व  कर रहे होते हैं. सिन्धु घाटी की सभ्यता का लोप शायद बाहर से आये आक्रामक आर्यों के आक्रमण से हुआ.यहाँ के मूल निवासी पराजित हुए और इसी देश में दुसरे दर्जे के लोग बन कर सदियों से जीते रहे.बौध धर्म का उदय और विस्तार हुआ, प्रचलित पाम्परिक धर्म भी चलता रहा. यह स्थिति शायद अच्छी थी. मगर क्रमशः सामाजिक दोषों से देश ग्रस्त  होता गया.इस्लामिक आक्रमण हुए और आक्रमणकारी विजयी  हुए. जो मुस्लमान यहीं के हो गए और जब उन्होंने बाहरी आक्रमण का सामना किया तो हार गए. महमूद घज्नवी, मोहम्मद घोरी, बाबर, अहमद शाह अब्दाली बहार से आये विजेताओं की फेहरिस्त हैं. इनके विजयी होने का हमारे इतिहास पर बड़ा व्यापक असर हुआ है. पानीपत की तीन लड़ाइयों ने इतिहास का रुख  बदल दिया और तीनों बार जो हिन्दुस्तान का प्रतिनिधित्व कर रहे थे वे हार गए.फिर अंग्रेजों का आना हुआ और आश्चर्य होता है की वो भी जीत गए. उनके जाते जाते पकिस्तान बन गया. देश का बहुत बड़ा हिस्सा यहीं के लोगों के लिए विदेश  हो गया. आज बचे हुए भारत में लोकतंत्र है जिस पर मुझे गर्व और ख़ुशी होती है. मगर यह देश संकटों से ग्रस्त दीखता है. बहुत बड़ी आबादी असंतुष्ट है. मैं चाहता हूँ की भारत बचा  रहे और यहाँ की संस्कृति बची रहे. यह देश बढे और विस्तार करे.चाहता हूँ की पाकिस्तान और बंगलादेश भी हमारे दुश्मन  न होकर हमारे ही बंधू हमारे ही लोग हों.मगर यह क्या है जो मैं बचाना चाहता  हूँ? मैं किसका विस्तार चाहता हूँ? मैं किस संस्कृति की बात कर रहा हूँ? क्या मैं "हिन्दू" धर्म और इसकी व्यवस्था को बनाये  और बचाना चाहता हूँ ? क्या मैं इसका विस्तार चाहता हूँ? शायद हाँ शायद नहीं.अगर सोचूँ तो लगता है की समय समय पर बाहर के लोगों और उनके विचारों का इस देश में आना हमारे देश को समृद्ध और सम्पूर्ण बनाता है. इस्लाम और अंग्रेजो से जो हमारा गहरा मिलना जुलना हुआ है उससे बहुत कुछ अच्छा हुआ है. हम बेहतर हुए हैं. अगर किसी तरह यह आचार विचारों का मिलन बगैर पराजित और परतंत्र हुए हो सकता तो अच्छा होता. मगर यह तो इतिहास है हम इसे बदल नहीं सकते. बदलना अच्छा है और यही समाज को जीवंत रखता है. इसमें मुझे कोई शक नहीं. तो फिर मुझे क्यों बुरा लगेगा अगर पूरा देश बदल कर इंग्लिश बोलने लगे या धर्म परिवर्तन कर लें. मैं इंग्लिश जानता हूँ और बोलता पढता भी हूँ. और यह अच्छा है बुरा नहीं. आप क्या सोचते हैं??????

शनिवार, 2 जनवरी 2016

नव वर्ष की शुभकामनाएँ

नव वर्ष की शुभकामनाएँ!
साल २०१५ बीत चुका है और हम सभी नए वर्ष की ओर एक नई आशा के साथ बढ़ चले हैं। मैं लंबे समय के बाद वर्धमान के माध्यम से आपसे मुखातिब हूँ। आशा करता हूँ कि नये साल में यह सिलसिला पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर और नियमित होगा।
ब्लॉग के माध्यम से बहुत से ऐसे शख्स से जुडऩे का मौका मिला जिन्होंने मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। इनमें प्रमुख रहें हैं- ज्ञानदत्त पांडे जी, प्रवीण पांडे जी, नीरज जाट जी, कविराय जोशी जी, मनोज जी , करण समस्तीपुरी जी, और भी बहुत से लोग। नये वर्ष में आप सभी सपरिवार स्वस्थ रहें, सुखी रहें ऐसी कामना करता हूँ।



शनिवार, 12 जुलाई 2014

ऑक्सफ़ोर्ड और श्रीमद्भगवद गीता


ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज ब्रिटेन ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में शिक्षा के प्रमुख केन्द्रों में से एक हैं.   मुझे याद नहीं है कि  कैसे मैंने पहली बार जाना था की ऑक्सफ़ोर्ड स्थित OCHS  के बारे मे।  यह है- ऑक्सफ़ोर्ड सेंटर फॉर हिन्दू स्टडीज।
यह ऑक्सफ़ोर्ड से जुड़े कई शिक्षाविदों द्वारा  चलाया जाने वाला एक केंद्र है जो हिन्दू धर्म और इसकी संस्कृति के अध्ययन में रत है.  समय समय पैर यह लंदन और अलग अलग शहरों में हिन्दू धर्म के विषयों पर शैक्षणिक  वार्ता का भी आयोजन करता रहता है.  कुछ वर्ष पूर्व  इसने अमिताभ बच्चन को आमंत्रित कर उन्हें सम्मानित भी किया था।

OCHS के द्वारा आप हिन्दू धर्म से जुड़े कई विभिन्न विषयो पर  ऑनलाइन पाठ्यक्रम में भी शामिल हो सकते हैं, मगर यह निशुल्क नहीं है. पिछले साल मैंने वेद और उपनिषद के  पाठ्यक्रम में शामिल भी हुआ था।  

इस साल मैंने भगवद गीता के अध्ययन का चुनाव किया है. यहाँ थोड़ा फर्क है की आप गीता का अध्ययन सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि शैक्षणिक विश्लेषक के दृष्टिकोण से कर रहे होते हैं.


श्रीमान निक  Sutton  इस कोर्स के प्रमुख प्राध्यापक  हैं.  एक इंग्लिश व्यक्ति की हिन्दू धर्म के ऊपर इतनी गहरी पकड़ बेहद प्रभावित करती है.  कई बार मैं उनके दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत नहीं हो पाता  हूँ क्योंकि  एक हिन्दू धर्मावलम्बी होने के कारण  मेरी अपनी धारणाएं हैं जो की शिक्षाविदों के दृष्टिकोण से विपरीत हो सकती है.  उदहारण के तौर पर - मेरे लिए यह बिलकुल ही मुश्किल है मान पाना कि गीता बौद्ध धर्म के उदय के उपरांत रची गई थी।  मैं अब भी इसके पक्ष और विपक्ष के प्रमाण ढूंढने की कोशिश कर रहा हूँ.  कई बार कोई ऐसी बात सुनते ही लगता है कि यह पाश्चात्य विद्वानों की पूर्वाग्रहग्रस्त मानसिकता  का प्रमाण है बस और कुछ नही. मगर हमारा यह दृष्टिकोण सकारात्मक नही है बल्कि हमें भी प्रमणिकता के आधार पर अपनी धारणा बनानी चाहिए. हालाँकि मैं अब भी इससे सहमत नहीं हूँ.
खाई आप को भी अगर वक्त मिले तो OCHS के वेबसाइट पर जरूर आएं और श्री निक सुट्टों  को जरूर सुनें. प्रस्तुत है यह लिंक :
http://www.ochs.org.uk






सोमवार, 27 जनवरी 2014

सरदार -- तुर्की नाई


साल से ऊपर हो गया जब हम पूर्वी लन्दन के ईस्ट हैम से घर बदल कर बार्किंग आ गए थे।  अगर मैं कहूँ कि साल भर  से जयादा हो गया है और मैं  किसी नाई की दुकान पर नहीं गया तो आप हैरान होंगे  और यह भी सोच सकते हैं कि मैं सिख/ सरदार जी   तो न हो गया।
बार्किंग में नया ठिकाना 
बात यह थी कि जब सर पर बाल कम रह गए तो सोचा कि अब कोई स्टाइल कि बात तो है  नहीं तो फिर क्यों न trimmer  से खुद ही  बाल काट लूं।  और ऐसा ही होता रहा।
नन्हे मियाँ के भी बाल घर पर ही कटते रहे।  पर अब लगने लगा था कि यह सही नहीं है औए शायद उसे भी एहसास होने लगा था कि उसके बाल कटाई में वो बात नहीं जो उसके कई साथियों में।
खैर पिछले सप्ताह से ही उसका उत्साह बना था कि आने वाले रविवार को स्विमिंग पूल और barber  के पास जाना है।
सुबह तरणताल ले जाने का वादा  निभाकर मैं थक कर सो गया था।  जब जागा  तो चार से ज्यादा बज चुका था और दिन का उजाला अब थोड़े समय का मेहमान था।
मैं और सम्यक - छोटे मियां - झट पट निकल पड़े एक अदद नाई की  खोज में।  बार्किंग नगर केंद्र ( सिटी सेंटर ) के पास कार पार्क की और पैदल चले  अपनी खोज पर।  शीघ्र ही एक दूकान दिखी - पर उसमे काटने और कटवाने वाले सभी एफ्रो- कैरिबियन मूल के थे और मुझे लगा कि थोडा और देख लूं - अगर न कुछ मिला तो यहीं वापस आ जाऊँगा।  मगर फिर जल्दी ही एक और दूकान दिखी जो शायद एशियाई या ईस्ट यूरोपियन हो ऐसा लगा। हमने इसकी सेवा लेने का निर्णय कर अंदर चले आये।
बातों बातों में पता चला कि नाइ जी टर्की मूल के हैं. मैं उनके काम और उसके प्रोफेशनलिज्म से बहुत प्रभावित था। पता चला कि वो होमोर्टन हॉस्पिटल के आईटी विभाग में भी काम करते हैं और बचे समय में अपने खानदानी व्यवसाय में भी हाथ बटाते हैं- हर रोज़- शाम के ६ के बाद और शनिवार/ रविवार को और भी लम्बे समय के लिए।
मैंने यह जताने के लिए कि मुझे टर्की के बारे में ज्ञान है मैंने पूछा क्या आप अंकारा से हैं? और उनका जवाब था नहीं  फिर उन्होंने एक दुसरे शर का नाम बताया जो मुझे अब याद नहीं है पर वो शार टर्की और सीरिया की सीमा पर है. फिर थोड़ी बात सीरिया के मौजूदा हालत पर भी निकल आई। पर ज्यादा बढी  नहीं।
 मैंने पूछा - क्या टुर्की भाषा अरबी से मिलती जुलती है है ? तो उनका जवाब था "नहीं-  बल्कि यह लैटिन के ज्यादा करीब है।  हम अरबी लोगो पर यकीन नहीं कर सकते। तुर्की नेता कमाल अत तुर्क ने अरबी जुबा और उसके पूरे तहज़ीब पर रोक लगा दी थी - और अब हालांकि कुछ कोशिश होती है कि फिर से टर्की में फिर से अरबी तहज़ीब को बढ़ावा मिले पर इसे कोई खाद समर्थन नहीं मिल रहा। "
इनका जवाब मेरी आशा  के विपरीत था.
मैंने उनका नाम पुछा तो जवाब था-"सरदार". मुझे हैरानी  हुई और  कहा कि हमारी जुबान में इसका  मतलब लीडर होता है तो  उन्होंने कहा "मुझे मालूम है  भारत के  "सरदार जी" बारे मे।" और पता चला कि तुर्की भाषा में भी सरदार का मतलब कमांडर ही होता है।  तो सरदार शब्द तुर्की भाषा से हिंदी में सामिल हुआ है!
फिर एक और मज़ेदार अनुभव हुआ।  उसने एक छोटी सी मशाल जैसी चीज़ निकाली, उसे स्पिरिट में डुबाया - मैं हैरानी से देख रहा था।  उसने उसमे आग लगाई और गर्म लौ से कान के बालों को झुलसाने लगा।  यह एक नया तजुर्बा था - हैरानी भरा और सुखद - सर्द मौसम में उष्म अनुभव।  फिर मिलने का वाद कर हम विदा हुए।  
चलते  चलते सम्यक ने उसे लोल्ली देने के वादे की याद दिलाई और अपना पुस्कार पा खुशी खुशी उमंग भरे क़दमों से बाहर निकल आया। 
नीचे दिया लिंक आपको भी इस तुर्की इल्म का एहसास देगा 
http://www.youtube.com/watch?v=F3z6_kz_wOU