शनिवार, 25 सितंबर 2010

५००० साल पुराणी मूर्ती.


यह ब्रिटिश नेशनल museum में रखी मिश्र से लायी एक मूर्ती है। यह ५००० साल पुराणी है, सिन्धु घाटी कि सभ्यता के समकालीन। मगर इस काल कि मिली भारतीय कलाकृति बहुत छोटी और कला कि द्दृष्टि से पिछड़ई लगती है।
इन को देख कर लगता है कि क्यों प्राचीन सभ्यताओं के वैभव में मिश्र का कोई सानी नहीं है.

कश्मीर

हमें बहुत बाद में पता चला था कि हिदुस्तान का जो नक्शा हम देखते और बनाते आये थे वो सच
नहीं था। नक़्शे में भारत की तस्वीर एक मानवीय मूरत लगती थी, और जान कर बेहद मायूसी हुई थी कि इस मूरत का सर कटा है या सर का मुकुट किसी और ने ले रखा है?
खैर, ISc करने जब हम सायंस कॉलेज में थे तो कश्मीर की ख़बरें हवा में उड़ने लगीं थीं। मुझे धुंधली सी याद है एक दिन कश्मीर से विस्थापित हिन्दू पंडित सम्माज के कुछ सदस्य कॉलेज के छात्रों से मिलने को आये थे। उन्होंने अपनी कहानी सुनायी थी जो मुझे याद नहीं; मगर याद है हैरानी और गुस्से का एक भाव जो मन को मथने लगा था। मुफ्ती सईद की बेटी का अपहरण हुआ था और कुछ लोगों को छोड़ा गया था। इंदिरा गाँधी ke समय में मकबूल बट को न छोड़े जाने पर राजनयिक lalit माकन की हत्या हुई थी और तत्पश्चात मकबूल ko फांसी। मालूम नहीं सरकार इस बार क्यों दिग गयी थी। फिर अखबार के पन्नों से आतंकवादी शब्द की जगह हलाकू का प्रयोग शुरू हो गया था जिसका मतलब क्या था मुझे अब भी मालूम नहीं।
कश्मीर की आजादी की मांग मुझे समझ में नहीं आती थी और अब भी नहीं समझ पाता हूँ। वो कौन है जो कश्मीर को गुलाम बनाये है ? और हम सबको उसके विरुद्ध खड़ा होना चाहिए, जैसे हम अंग्रेजों के विरुद्ध मिल कर खड़े हुए थे। फिर पता चला की वो तो मानते हैं की हमने / भारत ने ही उन्हें गुलाम बना रखा है। यह कैसे हो सकता है? वहां लोकतंत्र है वो अपनी सरकार चुनते हैं और चलते हैं, फिर गुलामी कैसी?

खैर सोचने के बाद मैं ये सोच कर आश्वस्त रहता था कि हमें कश्मीर कि चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शेष भारत में रहने वाले मुस्लिम और उनके नेता लोग ये सुनिश्चित करेंगे कि धर्म के आधार पर देश फिर से विभाजित नहीं हो सकता क्योंकि पाकिस्तान बनने के बाद भी इस देश के लोगों ने इसके सैधांतिक आधार को नकारते हुए साथ में रहते रहे हैं। अगर कश्मीर इस लिए अलग हुआ क्योंकि वहाँ की मुस्लिम बहुल जनता सेकुलर भारत के साथ नहीं रह सकती तो क्या फिर बचा हुआ भारत सेकुलर रहने की ताकत और हिम्मत रख पायेगा?

आज मैं उतना आश्वश्त नहीं हूँ। मानवीय अधिकार वर्तमान जगत में सबसे प्रभावी मूल मंत्र है। कल बीबीसी की UK की राष्ट्रीय खबर में "भारत प्रशाषित कश्मीर के उथल पुथल की खबर प्रमुखता से आयी थी। और मुझे लगता भी है की अगर वहां के लोग भारत के साथ नहीं रहना चाहते तो उन्हें क्यों जबरदस्ती रखा जाय?
अब भारतीय लोगों में, मीडिया में और सरकार में कश्मीर के प्रति प्रतिबद्धता में कमी दीखती है।
कुछ दिनों पहले सुरेश चिपलूनकर जी ने नवभारत के रिपोर्ट के विषय में लिखा था, अगर वह सच था तो स्थिति चिंता जनक है।
अभी सर्वदलीय दल कश्मीर गया था। अलगाववादियों से किसीने यह क्यों नहीं पूछा की उन्हें भारत से अलग क्यों होना है? ओमर अब्दुल्ला की सरकार उनकी सरकार है तो फिर उन्हें आजादी किस से चाहिए?

क्या यह बात कहना सही होगा की कश्मीर के लिए अगर जनमत होना है तो तो सिर्क कश्मीर के ही नहीं बल्कि पूरे देश के मुसलमानों को मत का अधिकार होना चाहिए। क्योंकि इस जनमत के stakeholder वो भी हैं.

शायद समय के साथ सब ठीक हो जायेगा?

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

डेंगू विषाणु जनित रोग है। अतः इसके उपचार में antibotics क़ी कोई भूमिका नहीं है।
डेंगू मच्छड़ के काटने से होता है। इन मच्छड़ को Aedes egypti कहते हैं ये दिन में काटने वाले मच्छड़ होते हैं। आम तौर पर ये आस पास जमे पानी में पैदा होते हैं। मच्छड़ के काटने के ७-१२ दिनों बाद बिमारी के लक्ष्ण दीखने लगते हैं।
डेंगू संक्रमण से जो लक्षण या बिमारी मरीज़ में होती है वह विभिन्न रूप क़ी हो सकती है। और इसलिए अलग अलग लोगों में यह बिमारी अलग रूप में दिखेगी। निम्नाकित तरह क़ी डेंगू हो सकती है-
  1. सामान्य वाइरल बीमारी - इसमें २-3 दिनों का सामान्य बुखार और बदन दर्द होता hai। कई बार तो डेंगू होने का शक भी नहीं होता। paracetamol ( crocin, calpol ) क़ी १-२ खुराक काफी है।
  2. डेगू बुखार - तेज बुखार २ से ७ दिनों तक। साथ में तेज बदन,, सर दर्द , आँखों के पीछे दर्द, जोड़ों का दर्द। कई बार त्वच पर दाने भी आ सकते हैं। इसमें भी कुछ ख़ास नहीं कर सकते - आराम, paracetamol, और पर्याप्त तरल आपूर्ति ही इलाज का आधार है। paracetamol का सही dose है वयस्क ke लिए ५०० मिलीग्राम -१ ग्राम हर 6 घंटे पर aur बच्चों के लिए १५ मिलीग्राम प्रति किलोग्राम वजन ke लिए हर ६ घंटे पर। कई बार इस बुखार के दौरान नाक, मसूड़ों से खों भी आ सकता है।
  3. Dengue hemorrhagic fever (DHF) : अब मामला गंभीर हो रहा है। यह बुखार के शुरू होने के ५-७ दिनों बाद शुरू होता है। शरीर के अन्दर डेगू विषाणु के विरुद्ध antibodies बनते hai जो हमारे रक्त नलिकाओं से प्रतिक्रिया कर उन्हें ऐसा कर देते हैं क़ी उनसे प्लाज्मा (रक्त का तरल पदार्थ) का स्राव हमारे शरीर कe ही अन्दर होने लगता है. फलतः रक्तचाप (BP) में गिरावट आने लगती है। ऐसी हालत में मरीज़ को भर्ती होना चाहिए और इलाज है पानी चढ़ाना ( IV fluids)
  4. डेंगू shock syndrome (DSS) : यह DHH का ही बढ़ा हुआ रूप है । डेगू से जो भी मौत होती है वह इसी के वज़ह से होती है। जो मरीज इस हालत में पहुँचते हैं उनका इलाज़ कठिन होता है, मगर अच्छी Intensive केयर सुविधा होने से इन्हें बचाया जा सकता है।

तो आप समझ सकते हैं क़ी अधिकतर लोगों को डेंगू का संक्रमण कुच्छ ख़ास नुक्सान नहीं पहुंचता है मगर दुर्भाग्यवश कुछ लोगों में समस्या गंभीर हो सकती है। बहुत ज़रूरी है क़ी हम उन गंभीर मरीजों को जल्दी पहचान सकें और उनका समय रहते इलाज शुरू हो सके। इसके लिए आम जानता में भी जागरूकता होनी चाहिए। कई बार शायद आपको ही स्वस्थ्य कर्मचारी से कहना पर सकता है क़ी क्या यह डेंगू है।

रक्त जांच: Full blood काउंट में हिमोग्लोबिन बाधा हो सकता है और प्लेटलेट कम ho सकता hai। हिमोग्लोबिन का ज्यादा होना और प्लेटलेट का कम होना DHH क़ी पहली निशानी हो सकती है।

यह था एक बेहद संक्षिप्त विवरण।

मूल बातें है:

  • दिन में काटने वाले मच्छड़ों से बचें। आस पास पानी न जमा होने दें।
  • डेंगू क़ी बिमारी मूलतः बारिश के बाद अगस्त -नवम्बर में फैलती है।
  • साधारण डेंगू के लिए आराम, paracetamol, और तरल आपूर्ति से जयादा कुछ नहीं चाहिए।
  • अगर ४-५ दिनों में मरीज़ क़ी हालत नहीं अच्छी हो रही है तो सावधान। डॉक्टर से मिलें और बताएं क़ी आपको डेंगू का शक है।

आशा है ये जानकारी कुछ काम क़ी होगी।

धन्यवाद .

डेन्गु बुखार

इसमें कोई शक नहीं कि आपमें से हर किसी ने डेंगू के बारे में सुन रखा होगा।


डेंगू से मौत कि खबर सुनी होगी।


मगर क्या कोई सवाल उठा है आपके मन में जिसका जवाब आप जानना तो चाहेंगे पर जानते नहीं?


भैया से बात हो रही थी और पता चला कि मां को दो दिनों से तेज बुखार आ रहा है। बदन में और सर में दर्द भी है। घर पर बात हुई और मन चिंतित और परेशां हुआ।


क्या यह डेंगू हो सकता है?


दो दिनों में बुखार टूट गया है और वो थोडा बेहतर मसूस कर रहीं हैं, blood टेस्ट में भी डेंगू negative है। मन को सांत्वना मिली।


यह बहाना बन गया पुराने पन्नों को उलटने का और डेंगू के बारे में अपनी जानकारी को ताज़ा करने का। सोच आप सब से भी इसपर बातें हो



मंगलवार, 14 सितंबर 2010

हिंदी


दिन भर कि झूटी मुस्कानों के बीच झूठी गिट पिट अंग्रेजी से बोझिल मन जब शाम में हेमंत कुमार के गीत सुनकर फिर से तरोताज़ा हो अंतर्जाल के पन्नों में निराला और अग्येय को ढूंढता है, पढता है और सुकून पाता है, मन सोचता है यह जादू किसी और जुबान में क्यों नहीं होता।
पटना पहुँच कर सुरेन्द्र भाई से बाल बनवाते हुए मोहल्ले कि जो बातें और राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर जो टिपण्णी जिस जुबान में होती है, वो हिंदी है, और उसका अनुवाद नहीं हो सकता। बातों का वह अंदाज़ और खुलापन हिंदी को मरने नहीं देता है।
हिंदी दिवस की शुभकामनायें

शनिवार, 4 सितंबर 2010

शैतान की परिकल्पना

मैंने यह पोस्ट लिखी है मगर नए सन्देश कि जगह यह एक नए पृष्ठ कि तरह प्रकाशित हो गया है। क्या आप इसे मेरे ब्लॉग पर ढूंढ और देख सकते हैं।
इसे कैसे सुधार जय बताएं।
धन्यवाद.

शनिवार, 14 अगस्त 2010

आज़ादी की सालगिरह मुबारक हो।
आपका लेख मुझे अच्छा लगा। गाँधी जी को हमें याद रखना होगा। वो हमारी रोशनी हैं। शिवम् मिश्रा जी थोड़े नाराज़ लगे, कोई बात नहीं, बहुत सरे लोगों ने अलग अलग तरह से अपने स्टार पर बलिदान दिया है और वे सभी हमारे पूजनीय हैं, मगर देश और काल से परे जो सच्चाई है वह सत्य और अहिंसा ही है, यही भारत की आत्मा है।
आपने अंग्रेजी मानसिकता के तिरस्कार की बात की है, मगर यहाँ भी हमें कोई वैर या द्वेष का भाव नहीं रखना चाहए, - अंग्रेजी मानसिकता क्या है? शायद आप उपभोक्ता वाद के तिरस्कार की बात कर रहें/रहीं हैं। फिर मैं आपसे सहमत हूँ, मगर इसे अंग्रेजी मानसिकता कहना पूरी तरह से सही नहीं है।
और जो स्वदेशी है हम उसपर गर्व तो बगैर किसी का तिरस्कार किये भी तो कर सकते हैं।
जय हिंद