सोमवार, 14 जून 2010

जो हो रहा है वह उससे गुस्सा होता है, हम अपने को अशक्त और लाचार मह्शूश करते हैं। आपका लेख इसी भाव को दिखाता है। यह कई लोगों के मन की बात है। शायद कुछ हो कभी न कभी । आपका मन दुखी है, इससे मुझे भी दुःख है, और संतोष भी की और भी लोग नाराज़ हैं।

गुरुवार, 3 जून 2010

धर्म और संस्कृति का परिवर्तन - अच्छा या बुरा

धर्म और संस्कृति का परिवर्तन - अच्छा या बुरा

भारत के इतिहास का अध्यन मेरे मन को दुखी कर देता है. इसमें, कदम कदम पर पराजय और मौकों को गवाने की कहानी है. बार .बार वे लोग हार जाते हैं जो इस जमीन और यहाँ की संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं.
सिन्धु घाटी की सभ्यता का लोप शायद बाहर से आये आक्रामक आर्यों के आक्रमण से हुआ.
यहाँ के मूल निवासी पराजित हुए और इसी देश में दुसरे दर्जे के लोग बन कर सदियों से जीते रहे.

बौध धर्म का उदय और विस्तार हुआ, प्रचलित पाम्परिक धर्म भी चलता रहा. यह स्थिति शायद अच्छी थी. मगर क्रमशः सामाजिक दोषों से देश ग्रस्त होता गया.

इस्लामिक आक्रमण हुए और आक्रमणकारी विजयी हुए. जो मुस्लमान यहीं के हो गए और जब उन्होंने बाहरी आक्रमण का सामना किया तो हार गए. महमूद घज्नवी, मोहम्मद घोरी, बाबर, अहमद शाह अब्दाली बहार से आये विजेताओं की फेहरिस्त हैं. इनके विजयी होने का हमारे इतिहास पर बड़ा व्यापक असर हुआ है. पानीपत की तीन लड़ाइयों ने इतिहास का रुख बदल दिया और तीनों बार जो हिन्दुस्तान का प्रतिनिधित्व कर रहे थे वे हार गए.

फिर अंग्रेजों का आना हुआ और आश्चर्य होता है की वो भी जीत गए. उनके जाते जाते पकिस्तान बन गया. देश का बहुत बड़ा हिस्सा यहीं के लोगों के लिए विदेश हो गया.

आज बचे हुए भारत में लोकतंत्र है जिस पर मुझे गर्व और ख़ुशी होती है. मगर यह देश संकटों से ग्रस्त दीखता है. बहुत बड़ी आबादी असंतुष्ट है.

मैं चाहता हूँ की भारत बचा रहे और यहाँ की संस्कृति बची रहे. यह देश बढे और विस्तार करे.
चाहता हूँ की पाकिस्तान और बंगलादेश भी हमारे दुश्मन न होकर हमारे ही बंधू हमारे ही लोग हों.

मगर यह क्या है जो मैं बचाना चाहता हूँ? मैं किसका विस्तार चाहता हूँ? मैं किस संस्कृति की बात कर रहा हूँ? क्या मैं "हिन्दू" धर्म और इसकी व्यवस्था को बनाये और बचाना चाहता हूँ ? क्या मैं इसका विस्तार चाहता हूँ? शायद हाँ शायद नहीं.

अगर सोचूँ तो लगता है की समय समय पर बाहर के लोगों और उनके विचारों का इस देश में आना हमारे देश को समृद्ध और सम्पूर्ण बनाता है. इस्लाम और अंग्रेजो से जो हमारा गहरा मिलना जुलना हुआ है उससे बहुत कुछ अच्छा हुआ है. हम बेहतर हुए हैं. अगर किसी तरह यह आचार विचारों का मिलन बगैर पराजित और परतंत्र हुए हो सकता तो अच्छा होता. मगर यह तो इतिहास है हम इसे बदल नहीं सकते.

बदलना अच्छा है और यही समाज को जीवंत रखता है. इसमें मुझे कोई शक नहीं. तो फिर मुझे क्यों बुरा लगेगा अगर पूरा देश बदल कर इंग्लिश बोलने लगे या धर्म परिवर्तन कर लें. मैं इंग्लिश जानता हूँ और बोलता पढता भी हूँ. और यह अच्छा है बुरा नहीं.

आप क्या सोचते हैं??????

गुरुवार, 27 मई 2010

जब जो करूँ उससे अलग कुछ न सोचूँ।

जीने के कई तरीके हैं। अलग अलग लोग अलग अलग तरीके से जीते हैं।

उपर उपर सरल गति से चलती जिन्दगी में भी सतह के अंदर तनाव और चिंता की लहरें मन को परेशां करती रहती हैं।

हमें बहुत कुछ करना होता है। बहुत सारी चिंताएं होती हैं। एक काम करते हुए दुसरे काम के बारे में सोचना पड़ता है। जीवन में तनाव का रंग अनजाने घुलने लगता है।

सोचा और पाया एक उपाय।

सूत्र : जब जो करूँ उससे अलग कुछ न सोचूँ।

अगर चल कर काम पर जा रहा हूँ तो यह न सोचूँ की पहुँच कर क्या करना है बल्कि अपनी चाल के प्रति सजग रहूँ। अगर ब्रुश कर रहा हूँ तो भी सारी सजगता इसके प्रति ही हो। अगर वंदना कर रहा हूँ तो फिर उससे इतर कुछ न सोचूँ।

यह MULTITASKING के विरुध्ध है। क्या इससे हमारी कुशलता और क्षमता कम हो जायगी। शायद नहीं। निश्चय ही चिंताएं ख़त्म होगीं और अनजाना तनाव भी कम होगा।

आज बुद्ध पूर्णिमा है। बधाई हो! शुभकामनायें.

बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

बधाई हो !

अभिवादन!!
बीबीसी हिन्दी पर मैंने देखा की भारतीय मूल के रसायन वैज्ञानिक श्री वेन्कट रामण रामकृष्णन को नाबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्होंने १९७१ में बडोदा विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद अमेरिका चले गए थे। वो कैम्ब्रिज से भी जुड़े रहे हैं। उन्होंने क्रोमोसोम में पाए जाने वाले डीएनए से प्रोटीन बनने की प्रक्रिया को सुल्झानेकी कोशिश की है। जीवन के रहस्य को समझने के लिए यह एक मौलिक खोज है। उनसे बात चीत का छोटा अंश बीबीसी हिन्दी.कॉम पर उपलब्ध है।
आप सबको उनकी सफलता पर बधाई।
मैं थोड़ा हैरान हूँ की ब्लोग्वानी में उनकी चर्च नही है। या शायद मैं विलंब से हूँ और ये ख़बर ब्लोग्वानी के लिए पुराणी हो गई है।
धन्यवाद
आपका राकेश

सोमवार, 14 सितंबर 2009

हिन्दी क्यों?

आज हिन्दी दिवस है। मुझे थोड़ा ऐसा ही लगता है जैसे १५ अगस्त को लगता है। बचपन में जो उत्साह हुआ करता था वह तो अब नही होता पर एक हल्का सा नशा तो होता है। अंतरजाल पर इधर उधर खंगालता हूँ हिन्दी में क्या उत्कृष्ट हो रहा है। थोडी खुशी और थोडी निराशा होती है।
पर मन में सवाल उठता है की हिन्दी के प्रति यह आग्रह क्यों है? मन में कुछ सार्थक तर्क तो उभरते हैं मगर फिर यही लगता है नही अब तो कुछ नही हो सकता। हिन्दी को प्रतिष्टित कर पाना अब शायद ही सम्भव हो। मैं देखता हूँ की जब हिन्दी की बात उठती है तो हिन्दी भाषी इस चक्कर में पड़ जाते हैं की कैसे इसे हिन्दी नही बोलने वालों में कैसे स्थाफित किया जाय। मगर समस्या है की जो लोग पारंपरिक रूप से हिन्दी बोलने वाले हैं उनमे कैसे इसे बढाया और परिष्कृत किया जाय।
पहली बात की हिन्दी को शायद राजनीति से मुक्त कराएँ। और जो लोग हिन्दी नही बोलते हैं उनमे जो इसके प्रति भय युक्त विद्वेष है वह ख़त्म हो। हिन्दी नही बोलने वालों में हिन्दी थोपने का आग्रह ख़त्म होना चाहिए।
इस दिन क्या ऐसा संकल्प हो सकता है की एक मेडिकल कॉलेज खुले और उसमे पढ़ाई का मध्यम हिन्दी हो। मेडिकल मैं इस लिए बोल रहा हूँ की इसका सीधा ताल्लुक उनसे है जो हिन्दी बोलते हैं। एक डॉक्टर अगर देश में रहता है तो उसके पूरे जीवन में अगणित ऐसे अवसर आते हैं जहाँ सिर्फ़ हिन्दी ही वह माध्यम होता है जो उसे उसके मरीज से जोड़ता है।
आप एक बात बताये की आप किसी दूकान पर जायें और वहां के कुछ कर्मचारी आपके सामने आपके बारे में एक ऐसी जुबान में कुछ गिट पिट करें जो आप समझ न सकते हों तो क्या आप उसे बर्दाश्त करेंगे। और यह निश्चय ही अशिष्टता होगी। आप किसी भी हॉस्पिटल में डॉक्टरों के रोज होने वाले राउंड को देखें। मरीज और उसके सम्बन्धी विस्मय और आशा भरी निगाह से डॉक्टरों के हुजूम की तरफ देखते रहते हैं और वो अपनी गिट पिट के बाद दो शब्दों में उन्हें कुछ समझाने की कोशिश करते हैं, और मरीज जनता है की उसे पूरा सच नही बताया जा रहा है जो इंग्लिश में उनमे आपस में बातें की है। अगर हिन्दी को बचाना है तो मरीजों को यह अपमान सहना बंद अकारण होगा और डॉक्टरों को यह अशिष्टता कतम करनी होगी। अगर आप परदेश में हों और ऐसा होता है तो सहनीय है मगर अपने ही देश में अपने ही डॉक्टर ऐसा करें यह सही नही है।
मैं ख़ुद पेशे से डॉक्टर हूँ। और मैं जानता हूँ की ऐसा इस लिए होता है क्योंकि हमने मरीज और उसके मर्ज़ का विवरण हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा में कैसे हो इसे सखा ही नही है। हम चाह कर भी शायद ऐसा न कर पाएंगे या इसे बेहद मुश्किल पाएंगे। मैं कहतअ हूँ की हिन्दी न तो कम से कम हिंगलिश ही शुरू करो।
आज इस हिन्दी दिवस पर येही प्रार्थना और सपना है की एक दिन हमें तकनिकी शिक्षा खास कर मेडिकल की पढ़ाई हिन्दी में मिलेगी और वो दिन होगा जब मैं आश्वस्त होऊंगा की नही हिन्दी और हमारी संस्कृति अक्षुण है ।
क्या yeh होगा ? शायद।
मैं अपनी संतान को हिन्दी सिखा रहा हूँ ।

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

जीवन चक्र

एक चक्र पूर्ण होता है।
या, यह आरम्भ है फिर से नए क्रम का?
खैर, जो सबसे मजेदार बात है कि
नए अर्थ उभरते हैं ,
छुपा अनजाना अहम् अचंभित करता है।
एक नए आयाम के प्रसव का दर्द
मैं भोगता हूँ , और फिर
इस नए उद्घाटन के सृजन का सुख ।
आंखों के आँसू में होठों की मुस्कान
घुलती जाती है - अजीब रंग है
सबसे अलग सबसे अनजाना
मन के परत खुलते हैं
धुंध फट जाता है - कुछ दीखता है
चक्र का कोई आरम्भ नहीं और
कहीं पूर्णता भी नहीं
बस यह सतत है
यह जीवन चक्र है।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

क्या आपने बच्चे में कुपोषण देखा है

हमारे देश में बच्चों में कुपोषण एक गंभीर समस्या है। और इसके दूरगामी परिणाम होंगे। कल बीबीसी पर चीन की आर्थिक प्रगति पर एक कार्यक्रम प्रसारित हो रहा था और ऐसा कहा जा सकता है की पिछले २० वर्षों में चीन ने extreme poverty को अपने देश से ख़त्म कर दिया है, हम इस मामले में अभी काफ़ी दूर हैं। हम सबको मिल कर कोशिश करनी चाहिए की कैसे हम अपने परिवेश में बच्चों के कुपोषण को दूर करें।एक तो वर्ग है जो अत्यधिक गरीब और समाज के सबसे नीचले पैदान पर है। उनके लिए तो सरकार को कुछ करना होगा। मगर एक वर्ग ऐसा भी है जो बहुत गरीब तो नहीं हैं मगर अन्य कारणों से उनके घर के बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं। मैं जो कहना चाह रहा हूँ उसका उद्देश्य इन घर के बच्चों के कुपोषण को दूर करना है।आज मैं मुंबई में कार्यरत एक paediatrician डॉ हेमंत जोशी के विचारों से अवगत हुआ। कुपोषण के ख़िलाफ़ उन्होंने जो एक बात सुझाई है वह है -" अन्ना का कोना" - घर के अन्दर एक ऐसा चबूतरा/डलिया हो जहाँ खाने के विभिन्न सामान रखें हो और वह घर के सबसे छोटे बच्चे की पहुँच के अन्दर हो. कई घरों में माँ और पिता शिकायत करते हैं की बच्चे खाना नही खाते, लेकिन शायद अगर खाबे की चीज़ बच्चों की पहुँच में हो और उसपर उनका नियंत्रण हो तो शायद बच्चे इसमे ज्यादा रूचि दिखायेंगे।दूसरी बात है की हम बच्चे को जो भी खिलते हैं उसमे थोड़ा वसा (घी या तेल) मिलाएं। इससे खाने का स्वाद तो बढ़ता ही है और पोषण क्षमता में भी वृद्धि होती है।ये कुच्छ मूल विचार हैं जो बच्चों के पोषण के लिए मदद गार हो सकते हैं१ महँगी चीज़ खरीद कर न खिलाएं जैसे डब्बे का दूध, होर्लिक्क्स, बौर्न्विता, बूस्ट इत्यादि२ घर बे बच्चों के लिए स्वादिष्ट टिकाऊ और पोषक आहार बनायें। मूंगफली, चना , गुड और घी के साथ मिला कर कुछ भी बनायें।३ खाने की कुच्छ स्वादिष्ठ चीज़ हमेशा बच्चे की पहुँच के अन्दर हो- "अन्ना का कोना"४ जब भी कुच्छ दान करने का मन हो तो पोषक आहार खरीद कर वहाँ दें जहाँ बच्चे रहते हों - यह दान ही इश्वर और ब्राहमण को जाएगा।५ जो भी सक्षम हैं वो ऐसे ज्ञान का प्रसार करें।अंततः आप सब इस सन्दर्भ में अपने विचार और ख्यालों को इस हम सबके साथ बाटें।dhayavad