शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

maowaad aur bhaarat me hinsa

मैं माओवादी हिंसा और ऐसे समाचारों को लेखा जोखा रखता रहा हूँ. मैंने अंतरजाल pआर इससे सम्बंधित जानकारियों को भी जमा करने की कोशिश की है. एक बात जो मुझे उभर कर सामने आती दिखाई देती है वोह है मिडिया में इस हिसात्मक कार्यवाही के खिलाफ एक सापेक्ष खामोशी।
अभी रोहतास में नक्सलियों ने BSF के कैंप पर धावा बोला था जिसमे ऐसी रिपोर्ट थी की १०-११ नक्सली अपराधी भी मारे गए हैं मगर यह बात सुच है ऐसा बताने की कोशिश मीडिया में बिल्कुल नही दिखाई देती है। यू-ट्यूब पर नक्सली से सम्बंधित जो भी vidios हैं वो भी ऐसा लगता है की नक्सलिय का एक तंत्र है जो उनकी तरफ्द्दारी और उनके कर्त्तोतों को सही करार देने के लिए सतत प्रयत्नशील है। अरुंधती रोय के विचार इतने पूर्वाग्रह ग्रस्त हैं की कोई शक नही होता की वो सिर्फ़ एक सेंसेशन सनसनीखेज ख़बर बनना चाहती हैं। सभी कहते हैं की नक्सलवाद की वजह व्याप्त गरीबी और असमानता है, यहाँ तक तो ठीक है मगर कोई यह क्यूं नही कहता की इसके नाम पर होता आतंक और हिंसा ग़लत है।
वह कौन है जो इसे हवा दे रहा है?
मैं यह कहना चाहता हूँ की वजह जो भी हो , जो सामाजिक जीवन में हिंसा का प्रतिपादन कर रहे हैं उन्हें रोकना होगा। उनकी शिकायत करनी होगी। मैं सैधांतिक रूप से मानता हूँ kइ सलवा जुडूमसही नही है मगर एकतरफा उसकी शिकायत करना भी निदान नही।
जो साधारण सिपाही मारे जा रहे है वो कोई सामंत नही साधारण आदमी हैं जो मेहनत से गरीबी से नकलने और अपने परिवार को निकलने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें छिप कर धोखे से मारना न तो कोई बहादुरी है न ही कोई क्रांति यह निरा आतंकवाद है अपराध है और किसी भी सभ्य समाज की जरूरत है की इसे समूल नष्ट किया जाय।
उनके रॉकेट लौंचेर और गोली बारूद का पैसा कहाँ से आता है? कोई इन अपराधियों के द्बारा होते मानव अधिकारों के हनन की बात क्यो नही करता? क्या इन माओवादियों के आका हमारे पत्रकारों और बुध्धिजीविओं को खरीद चुके है?

2 टिप्‍पणियां:

  1. जो साधारण सिपाही मारे जा रहे है वो कोई सामंत नही साधारण आदमी हैं जो मेहनत से गरीबी से नकलने और अपने परिवार को निकलने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें छिप कर धोखे से मारना न तो कोई बहादुरी है न ही कोई क्रांति यह निरा आतंकवाद है अपराध है और किसी भी सभ्य समाज की जरूरत है की इसे समूल नष्ट किया जाय।

    सही कहा आपने .........!!

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  2. kya bat hai! aap matrubhoomi se itni door rah kar bhi, naxal hinsa aur aise mamlo ka lekha jokha rakhte rahte hain... vahi yeh afsos ki baat hi kahi jaayegi aisa lekha jokha to yahan desh me bhi bahut se log nahi rakhte.....

    kya bolte ho bhaai, ki matrrubhoomi ki kadar tab hi mehsoos hoti hai jab ham vahan na ho...?


    mai bharat ke sabse jyada naxal prabhavit rajyon me se ek chhattisgarh ka rahne wala hun.... dekhta hu, rojana hi chhattisgarh ke kisi na kisi hisse me, naxaliyon ne itne mare, ye udaya vo kiya, ye bum milaa.... vaha barudi surang mili....

    jis baat par aap kah rahe hain ki koi is tarah ke manvadhikar hanan par koi baat kyun nahi karta, to bandhu.... link de raha hu...padhiyega..

    http://sanjeettripathi.blogspot.com/2008/01/blog-post_30.html

    http://sanjeettripathi.blogspot.com/2007/06/blog-post_10.html

    http://sanjeettripathi.blogspot.com/2007/06/blog-post_13.html


    http://sanjeettripathi.blogspot.com/2007/06/blog-post_07.html

    http://sanjeettripathi.blogspot.com/2009/04/blog-post_08.html


    muaafi chaahunga bandhu,itne saare links dene ke liye, lekin agar aap in links ko padhte hain to chhattisgarh me so called naxalwad ya sahi artho me aaj ka maaowad... aapke saamne ujagar hota, mere blog me aur bhi bahut kuchh hai is mudde par, lekin agar mai sabhi link de dun to aap mujhe pehchan ne se hi inkaar kar denge.. ;) (joking)


    baki aap anil pusadkar jee ke blog ke followr hai... so aap jante hi honge bahut kuchh....

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