सोमवार, 14 जून 2010

जो हो रहा है वह उससे गुस्सा होता है, हम अपने को अशक्त और लाचार मह्शूश करते हैं। आपका लेख इसी भाव को दिखाता है। यह कई लोगों के मन की बात है। शायद कुछ हो कभी न कभी । आपका मन दुखी है, इससे मुझे भी दुःख है, और संतोष भी की और भी लोग नाराज़ हैं।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी बैचेनी सही है। वही है जो आज के हर जागरुक नागरिक की है। पर मुसीबत ये है कि कोई नहीं समझ पा रहा कि करें क्या। पिछली पोस्ट भी काफी अच्छी लिखी है आपने। जब हमारे महान राष्ट्र की सभ्यता जिसे आज हिंदू समाज कहा जाता है, उसने अपने आप को समेट लिया, कूपमंडूक बन गया, बस तभी से हमारा पतन शुरु हुआ। वरना क्या वजह थी कि सिकंदर की विश्वविजेता सेना भी झेलम के राजा पोरस से भिड़ंत होने के बाद ये जानकर विद्रोही हो उठी की अभी भारत से सबसे बड़े राजा से लड़ना बाकी है। जाहिर है कि उसके बाद से ही धीरे धीरे हम पतन की तरफ बढ़ते चले गए। बाकी बचा खुचा बौद्ध धर्म ने कर दिया। हर बड़ा योद्धा हथियार छोड़कर बौद्ध हो गया। और उसी वक्त हमारे हिंदु समाज ने दनिया से संवाद खत्म कर लिया। वरना क्या कारण था कि पड़ोस में पैदा होने वाले इस्लाम धर्म और उसके अनुयायियों से भारत के सभी राजा अनजान रहे। विश्व प्रसिद्ध नालंदा में इस्लाम के दर्शन की पढ़ाई ही नहीं होती थी। जिस दिन से हमारा समाज चोटी रखने के कारण की जगह चोटी रखने की अनिवार्यता के पीछे पड़ गया, जन्म से ही जाति तय करने लगा, तब से ही पराभव हुआ। पतन हुआ। अब देखो क्या होता है। हम खुद कुछ करते हैं या नहीं। केंद्र अब मजबूत होता है या नहीं। इसी पर सब कुछ निर्भर करता है।

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  2. कुछ संदर्भ समझ नहीं आया.

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  3. i am sorry,
    main ek tippanni likh raha tha jo ki galati se is tarah se prakashit ho gayi hai.

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