रविवार, 24 जुलाई 2011

उहापोह



लम्बे समय से उहापोह कि स्थिति बनी हुई है और सवाल अब भी अनुत्तरित है।





अनिश्चय कि स्थिति से कई निर्णय टलते रहते हैं और मैं इंतेज़ार कर रहा हूँ एक सुन्दर सुबह की, जब अँधेरा छट जायेगा और मुझे मालूम होगा कि क्या करना है और मैं बगैर किसी संशय के अपनी राह चल पडूंगा।





संयम का खेल है। या तो मैं सही वक्त का इन्तेजार करता रहूँ और फिर प्रहार करूं या फिर इस अनिश्चयता से घबरा कर; बस, कुछ तो करूं।










बात सीधी सी है, प्रवास की अवधि ८ साल से उपर हो गयी है मगर अब तक जान नहीं पाया हूँ कि कहाँ बसना है। एक लम्बी यात्रा अपने अंत का अंदेशा तो देती है मगर अंत दीखता नहीं है।





एक बेचैनी और झुंझलाहट सी होती है कि मैं इसका ज़वाब क्यूं नही जानता हूँ । हम बड़े बड़े सवालों का हल ढूँढने का दंभ भरते हैं मगर अपने इस निजी सवाल का जवाब मैं क्यों नहो ढूंढ पता हूँ।





सोचता हूँ तो पाता हूँ कि सदा ही निर्णय लेने में दुविधा के उहापोह से जूझता रहा हूँ। खुशनसीब हैं वो लोग जिन्हें हालात सफ़ेद और काले दो रंगों में दीखती है, मैं हमेशा सभीकुछ एक अन्थ्हीन सिलसिला के रूप में पाताहूँ जिसका कोई एक साफ़ रंग नहीं। कुछ भी सही नहीं कुछ भी गलत नहीं सभी कुछ परिस्थिति जन्य है।





मेरा निर्णय सूर्योदय कि तरह होगा, कोई हंगामा नहीं, कोई शोर नहीं, स्नैह स्नैह स्वतः परन्तु सच्चा, सुन्दर और शिव।










3 टिप्‍पणियां:

  1. मन में प्रश्न बस प्रश्नवत बना रहे, राह धीरे धीरे दिखने लगती है। कुछ न कुछ तो दिखेगा शीघ्र ही।

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  2. ऊहापोह के बाद चिंतन से सही दिशा मिलती है।

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  3. मनोज जी ने सही कहा है।वक्त बहुत कुछ ैअपने हाथ मे रखता है--- जब वो मुठी खोल देगा सब कुछ साफ हो जायेगा।शुभकामनायें।

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