शनिवार, 5 मार्च 2011

मिथक की सीमाओं के परे


हमारी पहचान के कई स्तर हैं। हमारी बोली, हमारी भाषा, हमारा धार्मिक और सांस्कृतिक विश्वास हमारी पहचान बनाते हैं। मेरा "मैंपन" इन सब से बना है। मगर ये सब ही मुझे कईयों से अलग भी करते हैं। मेरे मिथकीय विश्वास - मेरे राम जी, हनुमान जी, शंकर जी गणेश जी मरी पहचान हैं मगर कई बार मेरी येही पहचान मेरे कई "अपनों" को मुझे पराया मानने को विवश करती है।

आज सोते से नींद खुली तो पौ फटने वाली थी। अचानक कुछ सुन्दर मेरे अन्दर जगा। बाहर देखती नज़रें धीरे धीरे अन्दर देखने लगीं। एक सुन्दर शांत अनुभूति। और फिर अचानक लगने लगा कि कई मिथकीय अलग अलग वर्ण मिल कर एक सुन्दर उज्जवल सफ़ेद रौशनी बन रहे हैं। राम और खुदा कृष्ण और christ का फर्क ख़त्म हो रहा था।

हर देश और हर काल में ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने इस अंतर्धारा को जाना है और हमें इसके बारे में बताने कि कोशिश कि है। हम में से तकरीबन हर किसी को कभी न कभी जीवन के सुख या दर्द भरे चरम क्षण में इसकी झलक मिली है। फिर हम एक हो जाते हैं। भाई और बहन। सगे सहोदर।

1 टिप्पणी:

  1. जैसे जैसे हम सीमाओं से प्रश्न पूछने लगते हैं, हमारी सीमायें रास्ता दे देती हैं, विश्व बंधुत्व के लिये।

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